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चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग नोटिस खारिज

23rd April 2018   ·   0 Comments

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस उपराष्ट्रपति और राज्यसभा सभापति एम वेंकैया नायडू ने सोमवार को खारिज कर दिया। महाभियोग प्रस्ताव लाने का नोटिस कांग्रेस की अगुआई में सात दलों ने दिया था। इस पर 64 सांसदों के दस्तखत थे। कपिल सिब्बल ने इस पर कहा- उपराष्ट्रपति का फैसला अवैध है। इस फैसले से जनता का भरोसा टूटा है। हम इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएंगे।

भारत के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ- कांग्रेस
– सिब्बल ने कहा, “वेंकैया नायडू के आदेश ने देश की न्याय प्रणाली को संकट में डाल दिया है। सरकार इस मामले की जांच को लेकर गंभीर नहीं दिखाई देती। ये आदेश असंवैधानिक, बदनीयत भरा और जल्दबाजी में लिया गया है। बिना पूरी जांच के ही ये आदेश दे दिया गया है।’
– ‘‘हम इस मामले में निश्चित तौर पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करेंगे। हम ये सुनिश्चित करेंगे कि सीजेआई का इस याचिका से कुछ लेना-देना ना हो। जब इस प्रस्ताव पर सुप्रीम कोर्ट में चर्चा हो तो इसमें चीफ जस्टिस शामिल न हों। कोर्ट जो भी फैसला देगी, हम इसे स्वीकार कर लेंगे।’’
– ‘‘ऐसा भारत के इतिहास में कभी नहीं हुआ कि सांसदों द्वारा पेश किया गया प्रस्ताव पहले ही चरण में खारिज कर दिया गया हो। इससे लोगों का भरोसा टूटा है। उपराष्ट्रपति नायडू को प्रस्ताव खारिज करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कॉलेजियम से बिना राय लिए ये फैसला सुनाया।’’

ये कदम उठाकर कांग्रेस ने खुदकुशी की कोशिश की- भाजपा
– उधर, कांग्रेस के आरोपों और उपराष्ट्रपति के फैसले पर भाजपा ने भी प्रेस काॅन्फ्रेंस की। भाजपा नेता मीनाक्षी लेखी ने कहा, ‘”लोकतांत्रिक संस्थाओं को बर्बाद करना कांग्रेस का इतिहास रहा है। जनता का विश्वास और वोट खोने के चलते कांग्रेस न्यायपालिका को डराने और दबाव डालने की नीति को दोहरा रही है।’’
– वहीं, सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि वेंकैया नायडू ने सही फैसला किया। इसे शुरुआत से ही खारिज करके बाहर फेंक देना चाहिए था। कांग्रेस ने ये कदम उठाकर खुदकुशी की कोशिश की है।’’

फैसले पर कानूनविदों की राय अलग-अलग

– भाजपा नेता और सीनियर एडवोकेट अमन सिन्हा ने कहा, “मजबूत कानूनी सलाह-मशविरे के बाद नोटिस को खारिज किया गया। कांग्रेस के पांचों आरोपों पर चर्चा, सलाह और राय जानने के बाद सभापति इस नतीजे पर पहुंचे कि कानूनी तौर पर इनमें कोई दम नहीं है। ये अस्थिर और असंगत हैं और ऐसे में उन्होंने सिरे से नोटिस को खारिज कर दिया।”

– एक्टिविस्ट और एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कहा, “चीफ जस्टिस को बचाने के लिए लिया गया ये फैसला राजनीतिक और असंवैधानिक है। ये काफी चौंकाने वाला है कि 64 राज्यसभा सांसदों द्वारा हस्ताक्षर किया गया नोटिस, जिसमें 5 गंभीर आरोप लगाए गए हैं.. उसे सभापति ने खारिज करने का फैसला किया। सभापति को केवल ये देखना था कि नोटिस पर सदस्यों के हस्ताक्षरों की संख्या पर्याप्त है या नहीं। उन्हें ये नहीं देखना था कि आरोपों में कितना दम है। ये निर्णय जांच समिति को करना था।”

– बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने कहा, “ये बेहद सही फैसला था, जिसने देश के संवेदनशील लोगों को खुशी दी।”

– सीनियर एडवोकेट केटीएस तुलसी ने कहा, “ये बहुत ही गंभीर मसला था, हम न्याय व्यवस्था में भ्रष्टाचार जैसे कैंसर को पनपने नहीं दे सकते। इस चरण पर केवल इस नोटिस का परीक्षण कर इसे स्वीकार किया जाना था। राज्यसभा के सभापति के पास केवल ये जांच करने का अधिकार होता है कि नोटिस पर हस्ताक्षर करने वाले सदस्यों की संख्या कितनी है और वे सदन में मौजूद हैं या नहीं। अगर भ्रष्टाचार के आरोप हैं और ऐसे सबूत हो सकते हैं कि सीजेआई साजिश का हिस्सा रहे हों तो इसकी जांच प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए।

10 पेज के फैसले में उपराष्ट्रपति ने बताए नोटिस खारिज करने के आधार
– उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू ने अपने 10 पेज के फैसले में कहा, “नोटिस में चीफ जस्टिस पर लगाए गए आरोपों को मीडिया के सामने उजागर किया गया, जो संसदीय गरिमा के खिलाफ है। साथ ही कहा गया है कि उन्होंने तमाम कानूनविदों से चर्चा के बाद पाया कि यह प्रस्ताव तर्कसंगत नहीं है।”
– “सभी पांच आरोपों पर गौर करने के बाद ये पाया गया कि ये सुप्रीम कोर्ट का अंदरूनी मसला है। ऐसे में महाभियोग के लिए ये आरोप स्वीकार नहीं किए जा सकते।”
– सभापति ने बताया कि विपक्षी दलों के नोटिस को अस्वीकार करने से पहले उन्होंने कानूनविदों, संविधान विशेषज्ञों, लोकसभा और राज्यसभा के पूर्व महासचिवों, पूर्व विधिक अधिकारियों, विधि आयोग के सदस्यों और न्यायविदों से सलाह-मशविरा किया।
– उन्होंने पूर्व अटॉर्नी जनरलों, संविधान विशेषज्ञों और प्रमुख अखबारों के संपादकों के विचारों को भी पढ़ा। (पूरी खबर यहां पढ़ें)

कांग्रेस ने सीजेआई पर 5 आरोप लगाए थे
कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने शुुक्रवार को सभापति को सौंपे सांसदों के नोटिस का हवाला देते हुए पांच आरोप बताए थे। इनके आधार पर ही चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस लाया गया था।

1) पहले आरोप के बारे में सिब्बल ने कहा था, ‘”हमने प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट मामले में उड़ीसा हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जज और एक दलाल के बीच बातचीत के टेप भी राज्यसभा के सभापति को सौंपे हैं। ये टेप सीबीआई को मिले थे। इस मामले में चीफ जस्टिस की भूमिका की जांच की जरूरत है।’’
2) “एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज के खिलाफ सीबीआई के पास सबूत थे, लेकिन चीफ जस्टिस ने सीबीआई को केस दर्ज करने की मंजूरी नहीं दी।’’
3) “जस्टिस चेलमेश्वर जब 9 नवंबर 2017 को एक याचिका की सुनवाई करने को राजी हुए, तब अचानक उनके पास सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री से बैक डेट का एक नोट भेजा गया और कहा गया कि आप इस याचिका पर सुनवाई नहीं करें।’’
4) “जब चीफ जस्टिस वकालत कर रहे थे तब उन्होंने झूठा हलफनामा दायर कर जमीन हासिल की थी। एडीएम ने हलफनामे को झूठा करार दिया था। 1985 में जमीन आवंटन रद्द हुआ, लेकिन 2012 में उन्होंने जमीन तब सरेंडर की जब वे सुप्रीम कोर्ट में जज बनाए गए।’’
5) “चीफ जस्टिस ने संवेदनशील मुकदमों को मनमाने तरीके से कुछ विशेष बेंचों में भेजा। ऐसा कर उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग किया।’’

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