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खिलजी के आत्मदाह से भारत-पाकिस्तान की बातचीत तक, संपत सरल ने जमकर गुदगुदाया

25th January 2018   ·   0 Comments

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के पहले दिन यानी 25 जनवरी को यहां बने बैठक नाम के हॉल में जमकर ठहाके लगे.

जयपुर. गुरुवार को शुरु हुए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के पहले दिन यानी 25 जनवरी को यहां बने ‘बैठक’ नाम के हॉल में जमकर ठहाके लगे। जहां मशहूर हास्य कवि संपत सलर ने दैनिक भास्कर डॉट कॉम के एडिटर अनुज खरे के साथ हंसों, हंसों, फिर हंसों सेशन में चर्चा की। जिसमें संपत सलर ने अपने अनोखे अंदाज में सबको गुदगुदाया। जहां उन्होंने पद्मावत से लेकर सरकार तक पर जमकर व्यंग के बाण चलाए।

संपत सरल ने अपने सेशन की शुरुआत देश के अच्छे दिनों पर तंज कसते हुए कहा कि ‘जिन्होंने अच्छे दिन का वादा किया था उन्हे याद दिलाओ तो वो भी हसने लगते हैं।’
– उन्होंने कहा कि वे गद्द पढ़ता हूं कविताएं बहुत पहले पढ़ता था।’ इसके आगे उन्होंने अपनी रचना प्रतिशोध सुनाई।

उसकी शादी हुए सप्ताहभर हुआ था।
मैंने सलाह दी, “दोस्त, सिनेमा देखो, सैर-सपाटा करो। पत्नी को लिए-लिए क्या मंदिर-मंदिर भटकते फिरते हो?”
उसने कहा, “सुना है जोड़े ईश्वर बनाता है। बस, उसी को ढूंढना है।”

– इसके बाद संपत सरल ने अपनी लघु कथा सदाचार सुनाई।

पिता बिजली विभाग में है और पुत्र जलदाय विभाग में। दोनों ने शहर की एक कॉलोनी में बराबर ही में अपना-अपना नया मकान बनवाया है। पिता को मकान में नल कनेक्शन चाहिए और पुत्र को बिजली कनेक्शन। जबतक पिता घूस नहीं देगा, बेटा उसके यहां नल नहीं लगने देगा। जबतक बेटा घूस नहीं देगा , पिता उसके यहां बिजली कनेक्शन नहीं होने देगा।

पिता-पुत्र में जूतम-पैजार चाहे हजार होती हो, किन्तु भारतीय संस्कारों में अभी इतनी गिरावट नहीं आई है कि पिता-पुत्र ही परस्पर रिश्वत मांगने लगें। सो, बेटा बिजली की चोरी करता है और बाप पानी की।

– इसके आगे संपत सरल ने कहा कि हम लेखक लोग एक उंगली दूसरों की तरफ उठाते हैं तो तीन उंगलियां हमारी तरफ भी उठती है।
– जिसके बाद उन्होंने अकबर पर लिखी अपनी लघु कथा सुनाई। जिसका नाम है हें हें हें हें….

मेवाड़ के पराभव के पश्चात् ज्योंही मुगल सम्राट जलाल उद्दीन मोहम्मद अकबर सम्पूर्ण हिन्दुस्तान का अधिपति हुआ, त्योंही कवि कुंभनदास ने अब्दुर्रहीम खानखाना को फोन मिलाया।

रहीम ने पहली ही घंटी में फोन उठाया, “कहो कुंभनदास जी, आज हमारी याद कैसे आई?”
फारसी, संस्कृत, हिन्दी के उद्भट विद्वान व कवि, आलमपनाह अकबर के मुख्य सेना नायक और नवरत्नों में से एक, रहीम के मुख से बिना किसी पूर्व परिचय के यों अपना नाम सुनकर कुंभनदास को विस्फोटक आश्वस्ति हुई कि जब रहीम की फोनबुक में नाम फीड है, तो गुडबुक में भी हुआ ही समझो।
कुंभनदास ने पूछा, “आजकल बादशाह सलामत दिल्ली में हैं, आगरा में हैं कि फतेहपुर सीकरी में हैं?”
रहीम, “जी, फतेहपुर सीकरी में हैं।”
कुंभनदास, “तो आलमताब के सानिध्य में जमाओ शीघ्र ही सीकरी में कविसम्मेलन?”
रहीम, “लेकिन कुंभनदास जी, जहांपनाह तो कविता वगैरह समझते ही नहीं हैं?”
कुंभनदास, “यह तो और अच्छी बात हुई।…… हैलो, सीकरी में कविसम्मेलनों का सिलसिला सदैव के लिए चल पड़ेगा। बस, आप तो शहंशाह हुजूर तक यह रहस्य पहुंचादो कि काठ से बंधकर ही पत्थर तैर सकता है। कवि ही की कलम में वह धार होती है कि जघन्य नर संहारों को भी दुनिया धर्मयुद्ध मानने लगती है। कवि ही की वाणी में वह जादू होता है कि राजा की प्रत्येक मूर्खता को उसकी ‘लीला’ सिद्ध करदे।”
रहीम, “लेकिन कुंभनदास जी, आप तो कभी अपने एक पद में ‘संतन को कहा सीकरी सों काम’ कह चुके हैं?”
कुंभनदास, “वह तो महाराणा प्रताप ने बेटे अमर सिंह के जन्मोत्सव पर कविसम्मेलन में बुला लिया था, सो कहना पड़ा। हें हें हें हें।”

– इसके आगे संपत सरल ने कहा कि ये नेता जितने देश के काम नहीं आ रहे है उतने हम व्यंगकारों के काम आ रहे हैं। विपरीत परिस्थियों से ही व्यंग निकलता है, उन्होंने कहा कि आजकल लोग सोशल मीडिया पर हमारे व्यंग पढ़कर नीचे अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं। उन्होंने ऐसे व्यंगकार नहीं पढ़े हैं जो हमसे भी तीखा लिखते हैं जैसे हरिशंकर परसाई, शरद जोशी वे जिस तरह से छीलते थे पाखंड करने वालों को। इन्ही विपरीत परिस्थियों से व्यंग निकलता है।
– संपत सरल ने कहा कि जब किसान चैनल लॉन्च हुआ तो अमिताभ बच्चन को उसका ब्रैंड अंबेस्डर बनाया गया। तो किसी ने पूछा की अमिताभ बच्चन का खेती किसानी से क्या लेना देना। मैने कहा सरकार का मानना है फसल में दाने भले ना लगें, पौछे तो लंबे हों।
– योग दिवस पर बोलते हुए सरल ने कहा कि प्रधानमंत्री के प्रयासों से योग दिवस घोषित हुआ। उस पर उन्होने लिखा है कि ‘योग जरूर करना चाहिए, योग करने से न सिर्फ तनाव दूर होते हैं, शरीर भी इतना लचीला हो जाता है कि संकट के बीच किसी भी महिला के कपड़े पहनों फिट आते हैं।’

– इसके आगे संपल सरल ने अपना एक व्यंग सुनाया।
आज भी जो यह मानते हैं की भारत की आत्मा गांव में बसती है , मेरे ख्याल में उन्होंने गांव उतने ही देखे हैं जितनी की आत्मा।
जिस आदर्श गांव का जिक्र आज मैं करने जा रहा हूँ वैसे तो वह राजधानी दिल्ली से दशेक किलोमीटर पश्चिम में है।
चूँकि रास्ते में शराब के कई ठेके पड़ते हैं अतः यह घटती बढ़ती रहती है।
कहते हैं उक्त आदर्श गांव किसी जालिम सिंह नामक बसाया था ,
जो की निहायत ही ईमानदार और परोपकारी डाँकू थे, क्योंकि निर्वाचित नही थे।
हालाँकि बाद में उन्होंने भी डाँकू जीवन से वीआरएस लेकर पॉलिटिक्स ज्वॉइन कर ली थी।
उनको यह समझ आ गया होगा कि
एक डाँकू को जिनके यहाँ डकैती करने जाना पड़ता है
चुनाव जीत लेने पर वे ही लोग घर बैठे दे जाते हैं।

यों भी अपराध व राजनीती में वोएटिंग का ही अंतर तो रह गया है
संसद पर जिन आतंकियों ने हमला किया था सुरक्षा प्रहरियों ने उन्हें गोली मारने से पहले निश्चित ही कहा होगा
कि मानते हैं आप लोग बहुत बड़े अपराधी हैं ,लेकिन चुनाव जीते बिना अंदर नही जाने देंगे।
आदर्श गांव में दशों दिशाएं तीनो मौसम बारहों महीने व सातो बार होते हैं
बस एक तो गांव के उत्तर में हिमालय नही है और तीनो तरफ से समुद्र से घिरा हुआ नही है।
गांव वालों का अगर डाँकू जालिम सिंह आज जीवित होते तो यह दोनों चीजें भी गांव में होती।

गांव के लोग किफायती इस हद तक हैं की मिस्ड काल भी अपने फोन से नही करते हैं।
और दरियादिल ऐसे की करने के बाद फोन करके पूछते रहते हैं की मिस्ड कॉल मिला क्या।
गांव में कुल तेरह पर्यटक स्थल हैं तीन शराब के ठेके , एक मंदिर ,
एक प्राइमरी स्कूल ,एक पुलिस चौकी , दो कुएं और पांच शमशान घाट।

सरकारी ठेको के बावजूद हस्त निर्मित शराब को ही वरीयता दी जाती है
ताकि ग्लोब्लाइजेशन के इस भीषण दौर में आंचलिकता बरकरार रहे।
गांव के अधिकांश लोग शराब पीते हैं कई लोग नही भी पीते हैं।
जो नही पीते हैं वो पीने वालो को समझते बुझाते रहते हैं।
उनके समझाय से जब पीने वाले नही समझते हैं तो दुखी होकर वे भी पीने लगते हैं

लोगो में सरकारी नौकरियों के प्रति बड़ा मोह हैं ,
सबका प्रयास रहता है कि काम ऐसा हो जिसमे काम न हो ,
जहाँ तक काम का सवाल हैं मेहनत करने वाले को मजदूरी नही मिलती।
और जिसे मजदूरी मिल जाती है वो मेहनत बंद कर देता है ,
सबके आपसी सम्बन्ध गठबंधन सरकारों जैसे हैं अर्थात स्वार्थ ही दो लोगो को जोड़ता है।
उम्र का फसल भी रिस्तो में बाधक नही बनता दिन में बेटे का क्लासफेलो होता है,
शाम को वही बाप का ग्लासफेलो होता है।

गांव में जबसे हैंडपंप लगे हैं दोनों कुएं शर्त लगाकर कूदने के काम आ रहे हैं
स्कूल उतनी ही देर चलता है जितनी देर मिडडे मील चलता है।
पुलिस चौकी को लेकर मतभेद हैं की अपराध बढ़ने से चौकी खुली है या चौकी खुलने से अपराध बढे हैं।

पांच श्मशान घाटों से स्वंय सिद्ध है कि गांव में पांच जातियां रहती हैं। कहा जाता है कि मनुष्य के मरने के बाद भी उसकी जाती नहीं मरती।
एक दफा क जाती के लोगों ने अपना शव ख जाती के श्मशान में जला दिया। ख जाती वालों ने तुरंत अपना एक व्यक्ति मारा और उसे क जाती के श्मशान में जला कर बदला लिया।
अंतह लोकल विधायक ने दोनों जाती के एक-एक लोग मारवाकर उनके अपने-अपने श्मशानों में जलवाए तब जाकर शांति हुई।

जिसके बाद संपत सरल के साथ सवाल जवाब की सिलसिला शुरू हुआ।

अनुज खरे: इन दिनों जो आदमी बन रहा है वो सात तत्वों से बन रहा है। पृथ्वी, अग्नी, जल, आकाश, वायू और आधार कार्ड-पैनकार्ड तो मैं संपत भाई से जानना चाहुंगा कि नेता इनके अलावा और किन तत्वों से बनते हैं।
संपत सरल: नेता आठवां तत्व है जो उन आठ तत्वों को बनाता है।

अनुज खरे: इंसान इन दिनों सोशल होता जा रहा है। सोशल मीडिया पर आ रहा है। इंसानियत ऑफलाइन हो रही है, लाइक सब करते हैं, प्यार कोई नहीं कर रहा है, हम तुम के दायरे में मां-बाप भी नहीं समा रहे हैं, संपत भाई इतने कठिन समय में इतने सरल कैसे रहे।
संपत सरल:सोशल मीडिया से दूर रहकर। सोशल मीडिया आपको विस्तार देता है, लेकिन गहराई कम करता है।

– इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा अपना एक लेख सुनाया।

यदि किसी ने कुछ एक अक्षरों तक की मैकिंग कर डाली हो तो उसे फेंकने के लिए ट्विटर से बहतर जरिया नहीं है…
जो कुछ नहीं कर सकता है वो भी ट्वीट कर सकता है। एक बार जो ट्वीट करने लगता है वो कुछ नहीं कर सकता..
मैने तो सोशल मीडिया का लोहा उस दिन मान लिया जब एक सज्जन ने मैरी एक ही क्लिप को साल में सौ बार सुना और नीचे गाली लिखी-
नालायक हैसंपत सरल जिसने सालभर से रचना को छोड़ा कपड़े तक नहीं बदले।

अनुज खरे:आजकल एक मैसेज चल रहा है कि अगर पद्मावत में सन्नी देवोल होते तो इस फिल्म का क्या होता। जवाब ये आ रहा है कि खिलजी पेड़ पर चढ़ा होता और सेना आत्मदाह कर लेती। अगर संपत सरल आपने पद्मावत लिखी होती तो क्या होता।

संपत सरल: मैं अगर पद्मावत लिखता तो सच बताऊं अल्लऊद्दीन खिलजी का करेक्टर ऐसा बना देता कि पद्मिनी के जौहर की बजाए अल्लाउद्दीन खुद आत्मदाह कर लेता। ये राजनीतिक स्टंट लगते हैं। हिंदुस्तान की जनता समझदार है समझ जाएगी।

अनुज खरे: इन दिनों ईवीएम हैकिंग का मामला काफी चल रहा है। संपत भाई का दिमाग हैक कर लिया जाएगा तो क्या होगा।
संपत सरल:बच्चे पालना मुश्किल हो जाएगा।

अनुज खरे:ये स्किल्ड लोगों से भरा देश है, हमारा स्किल तो इस लेवल का है कि हम ट्रेन के टॉयलेट में जरा सी चेन से बंधे मग्घे से भी काम चला लेते हैं, चाय में टूट कर गिरे बिस्किट को दूसरे बिस्किट से निकाल लेते हैं, इसने स्किल्ड लोगों को सरकार स्किल सिखा रही है संपत भाई नाइंसाफी नहीं है….
संपत सरल:हिंदुस्तानी आदमी जुगाड़ सब जानता है। टैक्नोलॉजी कितनी भी आगे निकल जाए अपन वो लोग हैं जो इंडिकेटर देने के बाद भी हाथ निकालते हैं।

– इसके बाद अनुज खरे ने इस बात को आगे बढ़ाते हुए भोपाल का एक किस्सा शेयर करते हुए बताया कि वहां ट्रैफिक वाला एक तरफ पैर निकालता है और दूसरी तरफ मुड़ जाता है। अगर उससे पूछों की भाई इंडिकेटर तो दे देते तो कहता है पैर निकाला था ना।

अनुज खरे: दूरदर्शी मूर्खता करना इस देश की परंपरा सी रही है, इस बारे में संपत भाई से जानना चाहता हु आपका क्या विचार है दुरदर्शी मूर्खता को कैसे सीखा जा सकता है जो आज बड़े फायदे का सौदा हो गया है।
संपत सरल: देखों मूर्खताएं न हो तो इस देश की चहल-पहल खत्म हो जाए। मूर्खताएं हमेशा होती रही है। अब देखना है कि उसका कितना प्रतिशत घटता बड़ता रहता है। हम भी मूर्खताएं करते हैं।

अनुज खरे: आपकी एक रचना है आत्मा गई तेल लेने। तो आपकी आत्मा तेल लेने जाएगी, उस पर कितने प्रतिशत जीएसटी लगेगा।
संपत सरल:जीएसटी पर एक साथी कवि बड़ी अच्छी बात कही। ‘एक सेठ जी से किसी ने पूछ लिया कि सेठजी गुठखे पर जीएसटी बढ़ गई। वो भी बोले कोई बात नहीं पांच मिनट देर से थूकेंगे।’ हिंदुस्तानी आदमी अपना जुगाड़ कर लेता है।

अनुज खरे:ख्वाहिशों का इन दिनों ये हाल है कि आप जिस चीज की भी ख्वाहिश करोगे, यो तो वो इललीगल होगी या उसकी शादी हो चुकी होगी। इस पर आपका क्या व्यू है।
संपत सरल: इस पर भी किसी का वाक्य सुना था..रसोई से अगर ग्लास टूटने की आवाज आ रही है तो समझ लो पत्नी रसौई में है और गलती ग्लास की है।

अनुज खरे: कम्पयूटर की भाषा में कहे तो विचारों की असेंबलिंग और शब्दों के कट-पेस्ट से रिसाइकिल बिन में जा रहे हैं रिश्ते, भावनाएं भी फोरवर्ड की जा रही हैं। अब लाइन लोस इतना प्रभाव नहीं डाल पा रहा है। हम तुम के बीच मां-बाप भी नहीं आ पा रहे हैं। मैरा सवाल ये है कि आखिर आज की पीढ़ी और विचार असर डाल क्यों नहीं पा रहे हैं….
संपत सरल: हम संवेदनाओ और करुणा को उस स्तर पर जी नहीं पा रहे हैं, कुछ करियर की चिंता है, समाज का तानाबाना ऐसा हो गया है। हम लोग ज्यादातर अड्डे बाजी करते हैं। रोज बैठकर आपस में गपशप करते हैं वहीं से बातें निकलती हैं, आदमी का मिलना आपस में प्रत्यक्षय जरूरी है, हम जितना लेंग्वेज से सीखते हैं उससे ज्यादा बॉडी लेंग्वेंज से सीखते हैं। जब तक संवेदनाओं के उस स्तर तक जाएंगे नहीं, उनको महसूस नहीं करेंगे। वो बहुत जरूरी है।

– इसके बाद संपत सरल ने ललित सक्सेना जी की तो पंक्तियां सुनाई…कि पुल पार करने से पुल पार होता है नदी पार नहीं होती। नदी पार करने के लिए तो आपको नदी के भीतर से ही तैरकर या डूबकर ही जाना होगा।

अनुज खरे: कई बार लोग अंग्रेजी में बात कहते हैं, और अंग्रेजी में बात वहीं कहते है जहां उन्हे पूरा भरोसा होता है कि वो शायद हिंदी में ज्यादा अच्छे से कह सकते हैं, मैं संपत भाई से पूछता हूं कि इतनी अंग्रेजी क्यों..
संपत सरल: संसार की सभी भाषा सर्वोतम है। मैं अपनी बता दूं, आगे वाला अंग्रेजी और हिंदी जानता है तो मैं अंग्रेजी नहीं बोलता। सामने वाला हिंदी और राजस्थानी जानता है तो में हिंदी नहीं बोलता। अंग्रेजी में भी बहुत उंदा साहित्या लिखा गया है। हिंदी में भी लिखा गया है। लोक भाषाओं में भी बहुत अच्छा साहित्य है…गुजराती, राजस्थानी, अवधी, मैथली।

अनुज खरे:व्यंग बनता कैसे हैं, हालही में एक मैसेज चल रहा है कि उत्तर कोरिया तानाशाह ने कहा कि मैरी टेबल पर न्यूक्लियर बम का बटन है दबाउंगा तो सब तबाह हो जाएगा। तो ट्रंप साहब ने जवाब दिया कि मैरी टेबल पर उससे बड़ा है, उससे बड़ा धमाका होगा। केजरीवाल ने कहा कि बटन कोई भी दबाओ वोट बीजेपी में जाएगा तो मैं संपत सरल से पूछना चाहता हूं कि व्यंग में ये वेट आता कहां से है।

संपत सरल: जैसा होना चाहिए वैसा न होकर जो नहीं होना चाहिए वो होता है तो व्यंग पैदा होता है। आप सब लोग भी सभी घटनाएं देखते हैं एक व्यंगकार भी देखता है, लेकिन वो किताबे पढ़ता है ऐसे लोगों के साथ उठना बैठना है, तो वो बात को टकसाल में ढाल कर व्यंग बना देता है। वैसे हर आदमी व्यंगकार है। गांव के आदमी के पास चले जाओ, ऐसी बात बोलेगा की बड़े-बड़े सोच भी नहीं पाएंगे।

– व्यंग की बात पर अनुज खरे ने भी एक किस्सा शेयर करते हुए कहा कि एक रिक्शेवाला एक बड़ी दुकान के पास बैठा था। पसीना-पसीना होकर आ रहा था, दुकान पर पानी का जार रखा था। उसने दुकान वाले से पूछा कि साहब पानी पिला दीजिए। दुकान वाले ने कहा कि आदमी आएगा तो पिलाएगा। थोड़ी देरतक आदमी नहीं आया तो उसने फिर कहा – प्यास लग रही है पानी पिला दीजिए। दुकान वाला फिर बोला- आदमी आएगा तो पिलाएगा। जब दो-तीन बार ऐसा ही हुआ तो रिक्शावाला बोला- थोड़ी देर के लिए आप ही आदमी बन जाइए ना।
– अगर मार्मिकता व्यंग में न हो तो वो हास्य बनकर रह जाता है। शुद्ध हास्य बहुत गहरा असल लंबे समय तक नहीं छोड़ता है। मारकता होगी तो शायद छोड़ेगा।

अनुज खरे:श्री कृष्ण आज कुरुक्षेत्र के मैदान में होते, अर्जुन उसी समस्या में उसी कंफ्यूजन में खड़े होते तो आज श्री कृष्ण अर्जुन को कैसे समझाते। कि है कृष्ण— संपत भाई…
संपत सरल:मैं समझता हूं कि दुनिया कि पहली जो कविता थी वो गीता है, अर्जुन ने जब मना कर दिया कि सामने मैरे परिवार के लोग हैं मैं नहीं लड़ुंगा। तब श्री कृष्ण ने गीता के 18 अध्याय सुनाए। फिर अर्जुन से पूछा लड़ रहा है कि और सुनाऊं। अर्जुन ने देखा कि लड़ना ही ठीक है।

आखिर में अपने एक गद्द के साथ संपत सरल ने इस सेशन का अंत किया। जिसका नाम है ‘बातचीत’

भारत-पाकिस्तान ने जब कई दिनों तक बात नहीं की तो अमेरिका ने भारत से बातचीत की

भारत ने अमेरिका सलाह को आदेश मान पाकिस्तान से बातचीत की कि बातचीत करनी चाहिए

पाकिस्तान को डाउट हुआ कि भारत ने हमसे बातचीत के विषेय में भी बातचीत क्यों की

उसने भारत की बातचीत को लेकर तुरंत अमेरिका से बातचीत की

और क्या बातचीत की साहब भारत से क्या बातचीत करें वो तो बातचीत के अलावा कुछ करता ही नहीं

अमेरिका ने बातचीत में समझाते हुए बातचीत की आप दोनों का आपसी मसला है तो आप दोनों आपस में ही बातचीत करो।

इस प्रकार तीनों में बातचीत हो चुकी तो भारत और पाकिस्तान ने एक दूसरे से बातचीत की।

पाकिस्तान ने बातचीत का विषय पूछा, भारत ने कहा किसी भी फाइनल बातचीत तक पहुंचने के लिए जरूरी है कि हम लगातार बिना विषय का बातचीत करते रहें।

बिना किसा बातचीत का ही सु परिणाम कहो पकिस्तान बातचीत के बाद भी खूनखराबा नहीं छोड़ता और भारत में खूनखराबे के बाद भी बातचीत…

पाकिस्तान ने बातचीत के लिए भारत से पूछा आप बातचीत के लिए इस्लामाबाद आएंगे या हम दिल्ली आएं।

भारत ने कहा हर चीज में इतना जल्दबाजी ठीक नहीं।

पहले हमे बातचीत से बातचीत का माहौल बनाना चाहिए। फिर बातचीत से तय कर लेंगे की बातचीत के लिए कौनसी जगह सही रहेगी।

इतनी बातचीत के बाद भारत ने बातचीत की। बातचीत के लिए पहले आप दिल्ली आ जाओ फिर हम इस्लामाबाद आके बातचीत करेंगे या फिर इसका उल्टा कर लेते हैं।

जगह बदलने से कौनसी बातचीत बदल जाएगी। बातचीत से दोनों देशों में इस तरह की बातचीत का वातावरण बन चुका था कि दोनों ने परस्पर बातचीत की।

बातचीत सचिव स्तर की, मंत्री स्तर की और प्रधानमंत्री स्तर की हुई। दुर्भाग्य कहें या सोभाग्य सचिव, मंत्री और प्रधानमंत्री स्तर की बातचीत में सचिवों, मंत्रियों और प्रधानमंत्रियों ने तो बातचीत की।

किंतु स्तर सुधरा उस पर कोई बातचीत नहीं हुआ। बातचीत टूट नहीं जाए अत: अमेरिका लगातार दोनों देशों से बातचीत करिए कहता रहा कि ये आप दोनों का आपसी मसला है तो आप दोनों आपस में ही बातचीत करो।

प्रत्येक बातचीत में सारा जोर बातचीत पर रहा। पाकिस्तान ने बातचीत में कहा हम कश्मीर लेकर रहेंगे। भारत ने बातचीत में कहा हम कश्मीर सुंई की नोक की बराबर भी नहीं देंगे। चाहो तो दोबारा बातचीत कर लो।

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