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कोविन्द, दलित राजनीति और हिन्दू राष्ट्रवाद

15th July 2017   ·   0 Comments

KovindKovindदेश में ऐसे कई दलित नेता हैं जो हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति के पिछलग्गू हैं और दलितों के हितों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। दूसरी ओर, ऐसे गैर-दलित नेता भी हैं जो अंबेडकर के आदर्शों में सच्चे मन से विश्वास रखते हैं और दलितों के कल्याण के लिए काम करते हैं। कोविन्द ने निश्चित तौर पर आरएसएस की वह शपथ ली होगी, जो हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की बात कहती है। भारतीय राष्ट्रवादियों के लिए भारत का संविधान सबसे पवित्र पुस्तक है। अगर कोविन्द राष्ट्रपति बनते हैं तो वे हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए काम करेंगे या भारतीय संविधान की रक्षा के लिए?

 

रामनाथ कोविन्द को राष्ट्रपति पद का अपना उम्मीदवार घोषित कर, भाजपा ने एक बार फिर प्रतीकात्मक राजनीति का दांव खेला है। कोविन्द केवल नाम के लिए दलित हैं। असल में वे एक खालिस हिन्दू राष्ट्रवादी हैं। मोदी सरकार के पिछले तीन सालों के कार्यकाल में मुसलमानों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ-साथ दलितों के खिलाफ हिंसा में भी बढ़ोतरी हुई है। मद्रास आईआईटी में पेरियार स्टडी सर्किल को प्रतिबंधित किया गया और ऐसी परिस्थितियां निर्मित कर दी गईं कि रोहित वेमुला नाम के दलित शोधार्थी को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ा। दलितों के विरूद्ध गुजरात के ऊना में हिंसा हुई। एक समुदाय के तौर पर दलित, हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति के निशाने पर हैं। योगी के सत्ता में आने के बाद उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में भयावह दलित-विरोधी हिंसा हुई। योगी की सरकार बनने के बाद से ऊंची जातियों की हिम्मत बढ़ गई है। चन्द्रशेखर के नेतृत्व वाली भीम आर्मी ने जब दलितों पर हमलों का विरोध किया तो चन्द्रशेखर को गिरफ्तार कर लिया गया जबकि हमलावरों पर केवल मामूली धाराएं लगाकर उन्हें खुले घूमने की इजाज़त दे दी गई।

कोविन्द को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने दलितों के घाव पर मरहम लगाने की सतही कोशिश की है। हमें याद रखना चाहिए कि गुजरात कत्लेआम- जिसे गोधरा अग्निकांड के बहाने अंजाम दिया गया था-के तुरंत बाद मुसलमानों को प्रसन्न करने के लिए भाजपा ने डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम को देश का राष्ट्रपति बनाया था। यह भी एक प्रतीकात्मक कदम था, जिसने समाज में व्याप्त अल्पसंख्यक-विरोधी प्रवृत्तियों पर कोई प्रभाव नहीं डाला। प्रतीकात्मकता का अर्थ ही यह

देश में ऐसे कई दलित नेता हैं जो हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति के पिछलग्गू हैं और दलितों के हितों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। दूसरी ओर, ऐसे गैर-दलित नेता भी हैं जो अंबेडकर के आदर्शों में सच्चे मन से विश्वास रखते हैं और दलितों के कल्याण के लिए काम करते हैं। कोविन्द ने निश्चित तौर पर आरएसएस की वह शपथ ली होगी, जो हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की बात कहती है। भारतीय राष्ट्रवादियों के लिए भारत का संविधान सबसे पवित्र पुस्तक है। अगर कोविन्द राष्ट्रपति बनते हैं तो वे हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए काम करेंगे या भारतीय संविधान की रक्षा के लिए?

 

रामनाथ कोविन्द को राष्ट्रपति पद का अपना उम्मीदवार घोषित कर, भाजपा ने एक बार फिर प्रतीकात्मक राजनीति का दांव खेला है। कोविन्द केवल नाम के लिए दलित हैं। असल में वे एक खालिस हिन्दू राष्ट्रवादी हैं। मोदी सरकार के पिछले तीन सालों के कार्यकाल में मुसलमानों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ-साथ दलितों के खिलाफ हिंसा में भी बढ़ोतरी हुई है। मद्रास आईआईटी में पेरियार स्टडी सर्किल को प्रतिबंधित किया गया और ऐसी परिस्थितियां निर्मित कर दी गईं कि रोहित वेमुला नाम के दलित शोधार्थी को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ा। दलितों के विरूद्ध गुजरात के ऊना में हिंसा हुई। एक समुदाय के तौर पर दलित, हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति के निशाने पर हैं। योगी के सत्ता में आने के बाद उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में भयावह दलित-विरोधी हिंसा हुई। योगी की सरकार बनने के बाद से ऊंची जातियों की हिम्मत बढ़ गई है। चन्द्रशेखर के नेतृत्व वाली भीम आर्मी ने जब दलितों पर हमलों का विरोध किया तो चन्द्रशेखर को गिरफ्तार कर लिया गया जबकि हमलावरों पर केवल मामूली धाराएं लगाकर उन्हें खुले घूमने की इजाज़त दे दी गई।

कोविन्द को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने दलितों के घाव पर मरहम लगाने की सतही कोशिश की है। हमें याद रखना चाहिए कि गुजरात कत्लेआम- जिसे गोधरा अग्निकांड के बहाने अंजाम दिया गया था-के तुरंत बाद मुसलमानों को प्रसन्न करने के लिए भाजपा ने डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम को देश का राष्ट्रपति बनाया था। यह भी एक प्रतीकात्मक कदम था, जिसने समाज में व्याप्त अल्पसंख्यक-विरोधी प्रवृत्तियों पर कोई प्रभाव नहीं डाला। प्रतीकात्मकता का अर्थ ही यह

सामाजिक ढांचे के खिलाफ था, जो ब्राह्मण जमींदारों को जनता का प्रभु बनाता था। समानता के लिए संघर्ष, स्वाधीनता संग्राम के समानांतर चलता रहा। दलितों ने कई आंदोलनों के जरिए समानता के लिए संघर्ष किया। हिन्दू राष्ट्रवाद, जातिगत पदक्रम और जाति व्यवस्था के सदियों पुराने ढांचे को बनाए रखने का हामी है। सन् 1990 के दशक के बाद से, आरएसएस-भाजपा की राजनीति आरक्षण के विरोध पर आधारित रही है। उसने कई स्तरों पर दलितों को अपना हिस्सा बनाने के लिए काम किया। वनवासी कल्याण आश्रम आदिवासियों के हिन्दूकरण के लिए काम करता आ रहा है। सामाजिक समरसता मंच ‘समानता’ के विरूद्ध ‘समरसता’ की बात करता है। हिन्दू राष्ट्रवादी यह प्रचार करते रहे हैं कि दलितों ने हिन्दू धर्म की इस्लाम के हमले से रक्षा की।

पिछले कुछ समय से अंबेडकर भी संघ परिवार के प्रिय बन गए हैं। उन्हें एक ‘महान हिन्दू’ बताया जा रहा है और उनकी जयंती पर भव्य कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। सच यह है कि अंबेडकर और आरएसएस की राजनीति एक-दूसरे की धुर विरोधी हैं। अंबेडकर, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के हामी थे; हिन्दू राष्ट्रवाद, वैदिक काल के पदक्रम-आधारित समाज का समर्थक है। सोशल इंजीनियरिंग के जरिए दलितों को बाबरी मस्जिद के ध्वंस में भागीदार बनाया गया और उन्हें मुसलमानों के खिलाफ सड़कों पर हिंसा करने के लिए प्रेरित किया गया।

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