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वन बेल्ट वन रोड : इतिहास चीन के साथ नहीं है

17th May 2017   ·   0 Comments

सीपीईसी जैसी सैद्धांतिक वजह से भारत ने बैठक का विरोध किया है

क्या भारत ने 14 मई को बीजिंग में शुरू हुए चीनी वन बेल्ट वन रोड (ओबोर) के दो दिनों तक चलने वाले समागम में भाग न लेकर खुद को नुकसान पहुंचाया है ?
इस सवाल का भारत में बहुत सारे लोगों का जवाब ‘हां’ में होगा. जाने माने पत्रकार प्रेम शंकर झा, शायद इसी विचार को सबसे अच्छा मानते हैं, जब वो मामले को लेकर ये तर्क देते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीजिंग नीति ‘चीन के चेहरे से चिढ़े भारत की नाक कटाने’ जैसी है.
हालांकि ओबीओआर के लिए इन उत्साही लोगों को अपने रुख पर दोबारा विचार करना चाहिए, क्योंकि कई चीनी विशेषज्ञ तक इस ऊहापोह की स्थिति में हैं कि आखिर ओबीओआर किस तरह आगे बढ़ेगा?
मूल रूप से चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के दिमाग की उपज ओबीओआर 68 से अधिक देशों में फैले यूरेसिया और प्रशांत महासागर में व्यापार-कारोबार और आधारभूत संरचना वाली परियोजनाओं का एक संग्रह है. इसकी परिधि में 4.4 अरब लोग और वर्ल्ड डीजीपी का 40% हिस्सा आता है.
लेकिन, किसी के भी विचार इस बात को लेकर साफ नहीं हैं कि आखिर ये परियोजना किस तरह कार्य करेगी. जैसा कि पेकिंग यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर क्रिस्टोफर बाल्डिंग कहते हैं, ‘इसका मतलब है एक ही समय में सब कुछ और कुछ भी नहीं.’
च्युंग कांग स्थित ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर चेन्ग्गैंग ज़ू ने सीएनएन को बताया कि यह ओबीओआर किसी भी ‘ठोस’ के बजाय ‘दर्शन’ या ‘पार्टी लाइन’ के रूप में कुछ सोचने में मदद करता है.
सीएनएन के मुताबिक चीन में यूरोपीय संघ चैंबर ऑफ कॉमर्स के जेग वुटके ने चेतावनी दी है कि इस पहल का बहुत तेजी के साथ ‘चीनी’ कंपनियों द्वारा अपहरण कर लिया गया है, जिन्होंने इसे पूंजी नियंत्रण से बचने के लिए एक बहाने के रूप में इस्तेमाल किया है. साथ ही अंतर्राष्ट्रीय निवेश और भागीदारी के रूप में इसे छिपाते हुए देश के बाहर पैसे की तस्करी कर ली है.
भारी तामझाम और जोर-शोर से हुए प्रचार के बीच बीजिंग के इस समागम की सच्चाई यही है कि सिर्फ 29 सरकारों के राष्ट्राध्यक्षों ने इसमें भाग लिया, जबकि ओबीओआर में 68 देश शामिल हैं.
इस समागम में भाग नहीं लेने के पीछे भारत की सैद्धांतिक वजह साफ है. ओबीओआर में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) शामिल है, जो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से गुजरता है. ये गलियारा भारत का हिस्सा है और इसलिए भारत की संप्रभुता के लिए यह एक चुनौती है.
इस पक्ष की जबरदस्त विशेषताएं भी हैं और जिन्हें शी ने खुद कबूला है. यह अजीबोगरीब लग सकता है, लेकिन जैसा कि शी ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा है ‘सभी देशों को एक दूसरे की संप्रभुता, सम्मान और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना चाहिए और एक-दूसरे के अहम हितों और चिंताओं का भी ख्याल करना चाहिए.’

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