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ज्वलंत मुद्दा है आरक्षण का

11th June 2016   ·   0 Comments

वाराणसी. विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है नए-नए चुनावी मुद्दे भी उठने लगे हैं। कुछ मुद्दे सोची समझी रणनीति के तहत राजनीतिक दलों द्वारा उठाए जा रहे हैं तो कुछ सामाजिक संगठनों की तरफ से। इन मुद्दों में सबसे ज्वलंत मुद्दा है आरक्षण का। इसके पक्ष और विपक्ष में अभी से लामबंदी शुरू हो गई है। हालांकि आरक्षण का मुद्दा बिहार विधानसभा चुनाव से ही खड़ा हुआ है जिसे लेकर तमाम खेमेबंदी भी हुई। यहां तक कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत तक ने आरक्षण विरोधी बयान देकर आरक्षण विरोधियों को लामबंद करने की कोशिश की। यह दीगर है कि इसका असर उल्टा हुआ और भागवत के बयान को बिहार में भाजपा की हार के प्रमुख कारणों में एक माना जाने लगा। अब यूपी विधानसभा चुनाव से पहले भी यह मुद्दा उछाला जाने लगा है। हालांकि इस बार फिर से आरएसएस और भाजपा ही इस मसले पर बंटी नजर आ रही है। हालांकि आरक्षण विरोधी गुट ने भाजपा और कांग्रेस से आरक्षण के मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करने की मांग उठा दी है। माना यह जा रहा है कि यूपी विधानसभा चुनाव से पूर्व आरक्षण विरोध की अलख और कोई नहीं संघ परिवार ही जगा रहा है।
भाजपा की प्रस्तावित लखनऊ रैली को बनाया निशाना आरक्षण विरोधियों ने
भाजपा की तीन अप्रैल की प्रस्तावित लखनऊ रैली को ही निशाने पर लिया है। कहा है कि कुछ भाजपा सांसद पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए 117वें संविधान संशोधन के समर्थन में तीन अप्रैल को लखनऊ में रैली करने जा रहे हैं। इस रैली के लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और पूर्व अध्यक्ष, केंद्रीय गृह मंत्री और लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह तक को आमंत्रित किया गया है। इस बीच आरक्षण विरोधियों ने इसे वोट की सस्ती राजनीति करार दिया है। उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों से ही पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर अपनी नीति स्पष्ट करने की मांग की है। साथ ही उन्होंने अपनी मांग के साथ सर्वोच्च न्यायालय को भी जोड़ दिया है। पूछा है कि दोनों ही राष्ट्रीय दल स्पष्ट करें कि वे सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का सम्मान करते हैं या नहीं। इतना ही नहीं उन्होंने चेतावनी तक दे डाली है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय पलटने की कोशिश हुई तो सम्बन्धित राजनीतिक दलों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। आरक्षण विरोधियों ने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से अपील की है कि वे तीन अप्रैल की प्रस्तावित लखनऊ रैली में भाग न ले कर सर्वोच्च न्यायालय के प्रति सम्मान प्रदर्शित करें ।
आरक्षण विरोधियों का तर्क
आरक्षण विरोधियों ने कहा है कि भाजपा की लखनऊ रैली की एक प्रमुख मांग सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलटने के लिए संविधान संशोधन कर पदोन्नतियों में आरक्षण देना है। उन्होंने सवाल किया कि भाजपा नेतृत्व यह भी बताए कि पदोन्नति में आरक्षण की बैसाखी के सहारे कैसे भारत को स्वावलंबी और महाशक्ति बनाया जा सकेगा। साथ ही सरकारी सेवाओं में ज्येष्ठता और श्रेष्ठता को दरकिनार करने से देश का विकास कैसे होगा दी
चेतावनी सस्ती राजनीति के गंभीर परिणाम होंगे
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस मामले में वोट की सस्ती राजनीति की गई और संविधान संशोधन की किसी तरह की कोशिश की गई तो इसकी गंभीर प्रतिक्रिया होगी। उन्होंने यहां तक कहा कि वोट की राजनीति का आने वाले चुनावों में वोट से ही करार जवाब दिया जायेगा। प्रदेश के 18 लाख कर्मचारी- अधिकारी तथा छह लाख शिक्षक और उनके परिवार जन इस राजनीति का माकूल उत्तर देने को तैयार हैं। इसके लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाया जाएगा
कौन है जो पदोन्नति में आरक्षण का कर रहा विरोध
पदोन्नति में आरक्षण का विरोध शुरू किया है सर्वजन हिताय संरक्षण समिति ने। इसके अध्यक्ष शैलेन्द्र दुबे एवं प्रमुख पदाधिकारियों एए फारूकी, एचएन पाण्डे, डीसी दीक्षित, कायम रज़ा रिज़वी, रामराज दुबे, कमलेश मिश्र, आरपी उपाध्याय, वाईएन उपाध्याय, राजीव श्रीवास्तव, अजय तिवारी, पवन सिंह, देवेन्द्र द्विवेदी, अजय सिंह, डॉ मौलेन्दु मिश्र, आरती प्रसाद सिंह, पी के सिंह, मो नूर आलम, त्रिवेणी मिश्र, आनंद कुमार ने संयुक्त रूप से कहा है कि यूपी की सरकारी सेवाओं में पदोन्नति में आरक्षण को सर्वोच्च न्यायालय असंवैधानिक करार दे चुका है और विगत 11 मार्च को दिए गए ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इस बाबत सभी याचिकाएं खारिज कर दी हैं। बावजूद इसके केंद्र में सत्तारूढ़ दल भाजपा के कतिपय सांसद सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल खड़ा कर रहे हैं और पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए संविधान संशोधन की मुहीम चला रहे हैं। इसी सोच के साथ लखनऊ में रैली आयोजित की जा रही है। इससे प्रदेश के 18 लाख कर्मचारियों और 06 लाख शिक्षकों में भारी गुस्सा है ।

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