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सजा हो पर सुधार भी जरूरी

15th December 2015   ·   0 Comments

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कल निर्भया कांड को तीन साल हो रहे हैं। आज इसके एक दोषी किशोर की रिहाई हो सकती है, लेकिन उसकी सजा बढ़ाने की मांग भी उठ रही है। 2012 में इस घटना के बाद बलात्कार और स्त्री सुरक्षा पर बातचीत शुरू हुई। स्त्री संगठनों और एनजीओ ने 2002 से लेकर 2012 तक बलात्कार की घटनाओं में 142 फीसदी की बढ़ोतरी होने के आंकड़े पेश किए और किशोर अपराध अधिनियम में बदलाव किए जाने और अपराधियों की उम्र कम करने की मांग की। इसी सर्वे में कुल अपराधों में किशोर की हिस्सेदारी सिर्फ 1.2 फीसदी थी। इससे इतर सामाजशास्त्रियों ने पोर्न पर प्रतिबंध लगाने, अपराधियों के सामाजिक-आर्थिक परिवेश के अध्ययन कराने, सुधार गृह का माहौल ठीक करने की बात की। अफसोस इस दिशा में हम एक कदम भी नहीं चल सके। स्पॉटलाइट में पढ़े विशेषज्ञों की राय…

जेलों से कम नहीं बाल सुधार गृह

शिवकुमार शर्मा पूर्व जस्टिस, राज. हाईकोर्ट

देश में किशोर अपराध कानून में निश्चत रूप से न्यूनतम आयु सीमा 16 होनी चाहिए। इसके पीछे समुचित तर्क भी हैं। हमारे देश की जलवायु ऊष्ण है। इसके चलते शारीरिक विकास जल्दी होता है। साथ ही सामाजिक परिदृश्य भी बदल रहा है। बच्चों में फिल्मों और समाज के द्वारा अपराध की गं्रथी पनप जाती है। अपराध को उम्र के साथ जोडऩा गलत है। अपराधी अपराधी ही होता है। यदि किसी किशोर ने जघन्य अपराध कारित किया है तो चाहे उसकी उम्र 18 साल से कम हो उस पर भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत ही मुकदमा चलना चाहिए। अब हमें दूसरे पक्ष की ओर भी देखना होगा। यह पक्ष है सजा का। सजा का निर्धारण सामाजिक अवधारणा, अभिसमयों और विधि के अनुरूप होता है।

वर्तमान में किशोर अपराध कानून के तहत अधिकतम तीन वर्ष की सजा दी जा सकती है। दोष साबित होने पर किशोर सुधार गृह भेजा जाता है। बस दिक्कतें यहीं से शुरू होती हैं। किशोर सुधार गृह किसी जेल से कम नहीं होते हैं। यहां कि स्थिति देखकर कोई भी सहज रूप से अंदाज लगा सकता है कि यहां रहने के बाद किशोर अपराधी सुधर नहीं सकता है। वर्तमान में सभी राज्य सरकारें किशोर सुधार गृह संचालन का जिम्मा गैर संरकारी संगठनों को सौंप देती हैं। ज्यादातर किशोर सुधार गृहों में अमानवीय हालात होते हैं। कमरों में पंखे नहीं होते, शौचालयों में सफाई की व्यवस्था नहीं होती है। ऐसे में सुधार के विचार मात्र की ही कल्पना करना भी बेमानी होता है। किशोर कानून के तहत मित्रवत (फ्रेंडली) व्यवहार पहली शर्त होती है। लेकिन देखने में आता है कि किशोर सुधार गृहों से बाल अपराधियों के भागने की अक्सर घटनाएं सामने आती रहती हैं। कैदियों की तरह जब किशोरों को रखा जाएगा तो स्वाभाविक ही है कि वे भाग जाने की कोशिशों में लगे रहेंगे। सरकारों की ओर से किशोर सुधार गृहों को समुचित बजट भी नहीं दिया जाता है। ऐसे में किशोर अपराधियों में सुधार की अपेक्षा कैसे की जा सकती है।

बॉन्ड अव्यवहारिक

किशोर अपराध कानून की पालना नहीं होने पर होने पर संबंधित अधिकारियों को भी सजा दी जा सकती है, लेकिन बहुत कम ही मामलों में कभी सजा दी जाती है। सुधार के नाम पर किशोर अपराधियों को कोई व्यवसायिक कोर्स नहीं कराया जाता है। ऐसे में सजा पूरी करने के बाद किशोर अपराधी के पास अपराध की दुनिया में ही लौटने के सिवाय कोई चारा नहीं बचता है। अपराध की जघनता के आधार पर केस को जुवेनाइल बोर्ड की बजाय आईपीसी में चलाने का उपाय भी कारगर साबित नहीं हो सकेता है। या तो हमें अपराध की न्यूनतम आयु सीमा घटानी होगी अथवा वर्तमान व्यवस्था में ही काम करना होगा। सजा पूरी होने के बाद लीगल बॉन्ड भरने की अनिवार्यता भी व्यवहारिक साबित नहीं हो सकती है। ये अपराध कारित होने को किसी भी तरह से रोक नहीं सकता है। दरअसल, विदेशों के समान किशोर अपराधी पर सजा पूरी होने के बाद \’एंकल मॉनीटर\’ लगाने जैसे इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस उपायों को लागू किया जा सकता है।

कानून से नहीं बनेगी बात

अरविंद जैन बाल कानून विशेषज्ञ

बाल अधिनियम की जगह पर 1986 में पहली बार जुवेनाइल जस्टिस एक्ट बना। इस अधिनियम में 2000,2006 और 2007 में भी सुधार हुए। इस अधिनियम से पहले किशोर, 16 की उम्र तक के लड़कों को माना गया था जबकि लड़कियों की उम्र 18 मानी गई थी। 2006 में दोनों की उम्र 18 कर दी गई। बाल विवाह पर रोक लगाने के कानून, मत देने का अधिकार आदि सभी जगहों पर दोनों की उम्र 18 थी, इसलिए किशोर की उम्र दोनों के लिए 18 कर दी गई थी।

जुवेइनाइल 18 ही ठीक

निर्भया कांड के बाद कुछ गैर-सरकारी संगठनों और स्त्री अधिकार संगठन के लोगों ने जुवेनाइल की उम्र 18 से कम करके 16 या 15 कर देने की मांग की। इस मांग के समर्थन में उन्होंने 2002 से लेकर 2012 तक के बलात्कार के आंकड़े दिए और बताया कि इस तरह की घटनाओं में 142 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। लेकिन, इन आंकड़ों में जुवेनाइल की हिस्सेदारी सिर्फ 1.2 फीसदी की थी। आंकड़ों के लिहाज से देखें तो जुवेनाइल द्वारा किया गया अपराध कोई ज्यादा नहीं थी। इस बारे में जे एस वर्मा समिति ने जुवेनाइल की उम्र 18 से कम करने से मना कर दी। इस समिति के ऐसा करने की साफ सी वजह यह थी कि सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश पर ही 2006 में जुवेनाइल की उम्र 18 की गई थी।

तब यह भी तय किया गया था कि जुवेनाइल की उम्र वारदात को अंजाम देने की तारीख से मानी जाए। हालांकि, एक मामला अरिणीत दास बनाम बिहार राज्य का सुप्रीम कोर्ट में आया था। इसपर खंडपीठ में अरिजीत पसायत भी थे। उन्होंने कहा था कि जुवेनाइल की उम्र उसके कोर्ट में पेशी से मानी जाए। यह ठीक नहीं था। एक दूसरा मामला प्रताप सिंह बनाम झारखंड राज्य का आया था तब सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि जुवेनाइल की उम्र अपराध को अंजाम देने की तारीख से मानी जाए। ये दो फैसले विरोधाभासी थे, इसलिए 2006 के कानून में यह लिखित तौर पर साफ किया गया कि जुवेनाइल की उम्र अपराध को अंजाम देने की तारीख से मानी जाएगी। मतलब यह कि कोई भी अपराधी कोर्ट में इस बात के लिए अपील कर सकता है कि वह अपराध के समय जुवेनाइल था इसलिए मुझ पर जुवेनाइल एक्ट के तहत मुकदमा चलाया जाए।

सामाजिक अध्ययन हो

भारत में अदालत का जुवेनाइल के प्रति रवैया उदारवादी रहा है। अदालत 18 से कम या उससे थोड़ी ऊपर के उम्र वालों को सजाएं देने में बहुत सख्ती नहीं बरतता। लेकिन अदालत का एक नजरिया यह भी रहा है कि अगर इन अपराधियों को सजा नहीं देंगे तो चीजें कैसे नियंत्रण में आएंगी। हालांकि कानून सख्त होने के साथ-साथ अपराध में कमी आई हो ऐसा नहीं दिखता। पॉर्न पर रोक नहीं लगा सकते। ऐसे अपराधियों का कभी सामाजिक-आर्थिक अध्ययन नहीं कराया गया, फिर बिना मर्ज जाने कैसे अपराधों पर नियंत्रण पाने की उम्मीद कर सकते है?

डर के साये में है आधी आबादी

अंजलि सिन्हा लेखिका व महिला अधिकार कार्यकर्ता

समाज में यौन आक्रामकता (सेक्सुअल एग्रेशन) की घटनाएं बढ़ रही हैं। इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च आन वीमन व दो अन्य संस्थाओं द्वारा हाल ही एक सर्वे में शामिल 25 फीसदी पुरुषों ने यह माना कि उन्होंने किसी न किसी प्रकार से यौनिक हिंसा को किसी समय में अंजाम दिया है। इनमें से अधिकतर ने अपने पार्टनर के साथ ऐसा किया है। यौन हिंसा के मामले में रवांडा, मेक्सिको, क्रोशिया और चिली जैसे देशों से भी भारत आगे है। निश्चित ही ऐसे किसी वक्तव्य या सैम्पल सर्वे की अपनी सीमाएं होती हैं।

उनके माध्यम से हम पूरे युवा वर्ग को यौन अपराधी या यौन बीमार मानसिकता के कटघरे में खड़ा नहीं कर सकते। इसके बावजूद अगर कोई सीमित अध्ययन किसी खास प्रकार की रूझान दिखाता है तो उसके कारणों को गंभीरता से विश्लेषण कर निदान के लिए नीतियां और कार्यभार निकाला जाना चाहिए। खास तौर से ऐसे समाज में जहां यौन हिंसा की घटनाएं व्यापक रूप से घट रही है तथा जिसमें शामिल आरोपियों में युवा तथा किशोरों का अनुपात ज्यादा है। नेशनल क्राइम रेकार्ड ब्यूरो के मुताबिक भारत में रोज 90 महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं। एक सर्वे बताता है कि 96 फीसदी महिलाएं खुद को यौन हिंसा के प्रति असुरक्षित महसूस करती हैं। हर समय डर के साये में रहना पूरी आधी आबादी की मानसिक स्थिति के लिए नुकसानदेह है।

सुरक्षा ऑडिट जरूरी

पुलिस व न्यायिक सख्ती से अपराध पर काबू करना काफी हद तक संभव हो सकता है और इसे तो सुनिश्चित किया ही जाना चाहिए। महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल बनाने के लिए जरूरी है कि यह एक राजनीतिक मुद्दा बने तथा पूरे शहर के नियोजन में भी जेंडर भेद के मसले का हल निकाला जाए। इस संदर्भ में सिओल से सीखा जा सकता है। ये दुनिया में सबसे अधिक वीमन फ्रेंडली शहर है। यहां सुरक्षा-निगरानी का तंत्र विकसित किया गया है। ऐसे कार्यस्थलों को प्रमाण दिया जाता है जो महिला के सुरक्षा और सुविधा का बड़े कल्पनाशील ढंग से बेहतर उपाय करते है। पार्कों, सड़कों और दूसरे सार्वजनिक स्थलों का सुरक्षा ऑडिट होता है। हमारे यहां कि स्थितियों तथा पुरुष प्रधान सामाजिक तानेबाने को ध्यान में रखकर अन्य उपाय भी तलाशे जा सकते हैं। अध्ययन में यह भी पाया गया कि जो बच्चे विषम परिस्थितियों का शिकार होते हैं उनके बड़े होकर ऐसी हिंसा को अंजाम देने की आशंका अधिक रहती है। या ऐसे बच्चे भी अधिक हिंसाचारी बनते हैं जिन्होंने अपने सामने हिंसा को घटित होते देखा हो। अपनी मां के साथ पिता द्वारा शारीरिक या यौनिक हिंसा के मौन गवाह रहे हों या अपने पड़ोस में ऐसी घटनाओं को चुपचाप देखा हो।

हिंसक माहौल भी कारण

सर्वे में शामिल 34 फीसदी ने माना कि बचपन में उनके साथ यौन हिंसा हुई थी, 36.8 फीसदी ने कहा कि उन्होंने अपने साथ उपेक्षा का व्यवहार महसूस किया। समाज की मानसिकता की पड़ताल इसीलिए जरूरी है क्योंकि यह मुद्दा गंभीर है कि जिसके साथ प्रत्यक्ष हिंसा को अंजाम नहीं दिया जाता है वह भी ऐसे वातावरण के कारण अप्रत्यक्ष हिंसा झेलता है। अगर घर में पिता हिंसा करता है तो बच्चा सोचता है कि ऐसा करना आम बात है।

पिछले कई साल से सामाजिक स्तर पर काम करनेवाले कुछ संस्थाओं तथा व्यक्तियों ने भी इस बात को उजागर किया है कि कैसे गली-मुहल्ले, स्कूलों व पार्कों आदि जगहों पर कुछ बड़े बच्चे अपने से छोटे बच्चों के साथ उत्पीडऩ करते हैं। इन उत्पीडऩों में मारने-पीटने तथा कई तरह से चोट पहुंचाने के साथ ही यौन हिंसा का प्रतिशत अच्छा खासा होता है। दिल्ली की बवाना की एक पुनर्वास बस्ती की 8 से 13 साल की कुछ बच्चियों का कहना था कि कैसे उन्हीं की उम्र के लड़के उन्हें तंग करते हैं। ये किशोर होते बच्चे तंग करना अपना हक समझते ही हैं लेकिन अपने से छोटे या कमजोर लड़कों को भी अपने हिंसा तथा कुंठित मानसिकता का शिकार बनाते हैं। यह सब हमारे समाज तथा परिवार के अंदर गहरे बैठी हिंसा तथा कुंठित परिवेश का ही प्रतिबिंब है।

जुवेनाइल पर दुनिया का नजरिया

भारत में 18 साल से कम उम्र का अपराधी नाबालिग माना जाता है। सुनवाई जुवेनाइल जस्टिस (जेजे) बोर्ड में। सजा के नाम पर अधिकतम तीन साल बाल सुधार गृह में।

अमरीका के कई राज्यों में संगीन जुर्म पर 13 से 15 साल के किशोरों को गंभीर सजा दी जाती है, कुछ राज्यों में यह उम्र सीमा 10 साल है। उम्र कैद तक की सजा दी जाती है।

इंग्लैंड में 18 से कम उम्र के किशोरों को आम अपराधियों के समान सजा। चीन में 14 से 18 है आयु सीमा। फ्रांस में नाबालिग की उम्र 16 साल। सऊदी अरब में उम्र रियायत नहीं

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